35 साल पुराने फ्लैट फर्जीवाड़े में 73 वर्षीय महिला दोषी करार, अदालत ने सुनाई सजा
चंडीगढ़ अदालत ने हाउसिंग सोसाइटी में अवैध रूप से फ्लैट हासिल करने के लिए झूठा हलफनामा जमा करने के 35 साल पुराने मामले में 73 वर्षीय अमृत पाल कौर को भारतीय दंड संहिता (IPC) की धारा 420 (धोखाधड़ी) के तहत दोषी ठहराते हुए 6 महीने की साधारण कैद और 5,000 रुपए जुर्माने की सजा सुनाई है। जुर्माना नहीं भरने पर उन्हें एक महीने की अतिरिक्त सजा भुगतनी होगी।

मोहम्मद फ़ैज़ान
संपादक

चंडीगढ़ की एक अदालत ने हाउसिंग सोसाइटी फ्लैट आवंटन से जुड़े 35 साल पुराने धोखाधड़ी के मामले में 73 वर्षीय अमृत पाल कौर को दोषी करार दिया है। अदालत ने आरोपी को भारतीय दंड संहिता (IPC) की धारा 420 के तहत दोषी मानते हुए 6 महीने की साधारण कैद और 5,000 रुपये जुर्माने की सजा सुनाई है। यदि आरोपी जुर्माना भरने में विफल रहती है, तो उसे एक महीने की अतिरिक्त सजा काटनी होगी।
क्या था पूरा मामला?
यह मामला वर्ष 1991 का है, जब चंडीगढ़ यंग ड्वेलर्स कोऑपरेटिव हाउस बिल्डिंग फर्स्ट सोसाइटी लिमिटेड के तहत फ्लैट आवंटन की प्रक्रिया चल रही थी। उस समय की सरकारी नीति के अनुसार, यदि किसी व्यक्ति या उसके परिवार के नाम चंडीगढ़, पंचकूला या मोहाली में पहले से कोई संपत्ति मौजूद थी, तो वह इस सोसाइटी के फ्लैट के लिए पात्र नहीं था। अमृत पाल कौर ने उस समय एक हलफनामा जमा किया था जिसमें दावा किया गया था कि उनके या उनके परिवार के पास कोई संपत्ति नहीं है। हालांकि, जांच में यह तथ्य सामने आया कि उनके पति के नाम पर 1986 से ही सेक्टर-44 बी में एक मकान आवंटित था।
इस अनियमितता की शिकायत जुलाई 2014 में डिप्टी कमिश्नर-कम-रजिस्ट्रार, कोऑपरेटिव सोसाइटी द्वारा पुलिस को दी गई थी। इसके बाद अक्टूबर 2014 में सेक्टर-17 थाने में एफआईआर दर्ज की गई। इस मामले में अन्य आरोपी भी शामिल थे, जिनमें से आज्ञा राम और शकुंतला की मृत्यु हो चुकी है, जबकि राजेंद्र सिंह को भगोड़ा घोषित किया गया है।
अदालत की सख्त टिप्पणी और बचाव पक्ष की दलीलें
सुनवाई के दौरान बचाव पक्ष ने तर्क दिया कि हैंडराइटिंग एक्सपर्ट की रिपोर्ट में हलफनामे के हस्ताक्षर और नमूना हस्ताक्षरों का पूरी तरह मिलान नहीं हुआ है। अदालत ने इस दलील को खारिज करते हुए कहा कि 24 वर्षों के लंबे अंतराल के कारण हस्ताक्षर में स्वाभाविक बदलाव आना सामान्य है। इसके अलावा, एफआईआर दर्ज करने में हुई देरी को लेकर दिए गए बचाव पक्ष के तर्क को भी अदालत ने यह कहते हुए नकार दिया कि धारा 420 के तहत अपराध में समय-सीमा की बाधा लागू नहीं होती।
अदालत ने अपने फैसले में स्पष्ट किया कि यदि अमृत पाल कौर ने झूठा हलफनामा नहीं दिया होता, तो उन्हें यह फ्लैट कभी आवंटित नहीं किया जाता। आरोपी ने संबंधित प्राधिकरण को गुमराह करके अनुचित लाभ प्राप्त किया, जो कि धोखाधड़ी की श्रेणी में आता है।
उम्र के आधार पर सजा में नरमी
न्यायालय ने सजा सुनाते समय मानवीय दृष्टिकोण अपनाते हुए आरोपी की 73 वर्ष की उम्र और 2018 से चल रही लंबी कानूनी प्रक्रिया को ध्यान में रखा। इसी कारण उन्हें न्यूनतम संभव सजा दी गई। अमृत पाल कौर को 2015 में इस मामले में गिरफ्तार किया गया था और तब से वे कानूनी लड़ाई लड़ रही थीं।
यह फैसला उन लोगों के लिए एक कड़ा संदेश है जो सरकारी योजनाओं का लाभ उठाने के लिए गलत जानकारी या फर्जी दस्तावेजों का सहारा लेते हैं। अदालत ने स्पष्ट कर दिया है कि समय बीत जाने के बावजूद धोखाधड़ी के मामलों में कानून का शिकंजा कसना तय है।

संपादक
मोहम्मद फ़ैज़ान
टिप्पणियाँ (2)
- अअमित कुमार2 घंटे पहले
बहुत बढ़िया और संतुलित रिपोर्टिंग। FN News पर भरोसा बना रहता है।
- ससपना ठाकुर4 घंटे पहले
ग्वालियर-चंबल की खबरें इतनी डिटेल में और कहीं नहीं मिलतीं। शुक्रिया!