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दिल्ली दंगा मामला: 12 आरोपी बरी, अदालत ने कहा- भीड़ में होना ही अपराध का सबूत नहीं

दिल्ली की एक अदालत ने 2020 के उत्तर-पूर्वी दिल्ली दंगों के मामले में 12 आरोपियों को हत्या, दंगा और डकैती के आरोपों से बरी कर दिया। कोर्ट ने कहा कि किसी व्यक्ति के खिलाफ सिर्फ इसलिए आपराधिक जिम्मेदारी तय नहीं की जा सकती, क्योंकि वह गैरकानूनी भीड़ का हिस्सा था।

मुश्ताक अहमद खान

मुश्ताक अहमद खान

Editor In Chief

31 अगस्त 20263 मिनट पढ़ें
दिल्ली दंगा मामला: 12 आरोपी बरी, अदालत ने कहा- भीड़ में होना ही अपराध का सबूत नहीं
मूल स्रोत

वर्ष 2020 में उत्तर-पूर्वी दिल्ली में हुए दंगों से जुड़े एक महत्वपूर्ण मामले में दिल्ली की एक अदालत ने 12 आरोपियों को बरी कर दिया है। अदालत ने अपने फैसले में स्पष्ट किया कि केवल किसी गैरकानूनी भीड़ का हिस्सा होने मात्र से किसी व्यक्ति को हत्या या डकैती जैसे गंभीर अपराधों का दोषी नहीं ठहराया जा सकता। न्यायाधीश ने इस बात पर जोर दिया कि आपराधिक जिम्मेदारी तय करने के लिए आरोपी के विशिष्ट व्यक्तिगत कृत्यों के ठोस सबूत होना अनिवार्य है।

क्या था पूरा मामला और अदालत की टिप्पणी

यह मामला मुरसलीन नामक व्यक्ति की हत्या से जुड़ा था, जिसका शव 28 फरवरी 2020 को जौहरीपुर तिराहे के समीप एक नाले से बरामद किया गया था। इस मामले में लोकेश सोलंकी, पंकज शर्मा, अंकित चौधरी, प्रिंस, जतिन शर्मा, हिमांशु ठाकुर, विवेक पंचाल, ऋषभ चौधरी, सुमित चौधरी, टिंकू अरोड़ा, संदीप और साहिल को आरोपी बनाया गया था। अतिरिक्त सत्र न्यायाधीश परवीन सिंह की अदालत ने सुनवाई के दौरान पाया कि अभियोजन पक्ष इन आरोपियों के खिलाफ ठोस साक्ष्य पेश करने में विफल रहा है।

अदालत ने अपने आदेश में कहा कि यदि कोई व्यक्ति गैरकानूनी भीड़ का हिस्सा है और घातक हथियारों से लैस है, तो यह उसका व्यक्तिगत कृत्य हो सकता है जो कानून के तहत एक अलग अपराध है। हालांकि, केवल भीड़ में शामिल होने के आधार पर उस पर हत्या या लूट जैसे अन्य गंभीर आरोपों को नहीं मढ़ा जा सकता। कोर्ट ने कहा कि अभियोजन को यह साबित करना था कि प्रत्येक आरोपी ने व्यक्तिगत रूप से कौन सा अपराध किया है, जिसमें वह पूरी तरह नाकाम रहा।

गवाहों के बयानों में नहीं मिली सच्चाई

सुनवाई के दौरान अभियोजन के मुख्य गवाह दिवेश राजपूत, जिसे मुरसलीन की हत्या का प्रत्यक्षदर्शी बताया गया था, अपने बयान से मुकर गया। लंबी जिरह के बावजूद उसके बयानों से यह स्पष्ट नहीं हो सका कि आरोपियों का हत्या या भीड़ की हिंसा से कोई सीधा संबंध था। इसी प्रकार, एक अन्य गवाह निसार अहमद ने भी आरोपियों द्वारा किसी विशेष कृत्य को अंजाम देने की पुष्टि नहीं की। अदालत ने पुलिस गवाहों की गवाही पर भी सवाल उठाए, जो भीड़ में शामिल लोगों की सटीक पहचान करने में असमर्थ रहे थे।

अदालत ने टिप्पणी की कि केवल यह कह देना कि किसी ने भीड़ को देखा था, यह साबित करने के लिए पर्याप्त नहीं है कि वही भीड़ घर में तोड़फोड़, लूट और आगजनी के लिए जिम्मेदार थी। पुलिस द्वारा आरोपियों के नाम पुकारे जाने की आवाज सुनने के दावे को भी अदालत ने ठोस पहचान मानने से इनकार कर दिया।

एक आरोपी को मिली सजा

हालांकि, इस मामले में एक आरोपी हिमांशु ठाकुर को आंशिक रूप से दोषी पाया गया। अदालत ने उसे भारतीय दंड संहिता (IPC) की धारा 411 के तहत दोषी ठहराया है। जांच में पाया गया कि मृतक मुरसलीन का मोबाइल फोन हिमांशु के पास से बरामद हुआ था और वह उस हैंडसेट में अपना सिम कार्ड इस्तेमाल कर रहा था। इस विशिष्ट साक्ष्य के आधार पर अदालत ने उसे चोरी की संपत्ति रखने के अपराध में दोषी माना है।

यह फैसला दिल्ली दंगों से जुड़े मामलों में साक्ष्यों की गुणवत्ता और कानूनी प्रक्रिया की बारीकियों को रेखांकित करता है। अदालत का यह रुख स्पष्ट करता है कि भीड़ हिंसा के मामलों में सामूहिक जिम्मेदारी के बजाय व्यक्तिगत भूमिका का निर्धारण करना न्याय के लिए अत्यंत आवश्यक है। फिलहाल, शेष 11 आरोपियों को सबूतों के अभाव में बरी कर दिया गया है, जो कानूनी प्रक्रिया में साक्ष्य की कमी के महत्व को दर्शाता है।

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टिप्पणियाँ (2)

  • अ
    अमित कुमार2 घंटे पहले

    बहुत बढ़िया और संतुलित रिपोर्टिंग। FN News पर भरोसा बना रहता है।

  • स
    सपना ठाकुर4 घंटे पहले

    ग्वालियर-चंबल की खबरें इतनी डिटेल में और कहीं नहीं मिलतीं। शुक्रिया!

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