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14 साल का लंबा संघर्ष खत्म: हादसे में पैर गंवाने वाली चांदनी ने फिर थामी जिंदगी की डोर

उदयपुर के नारायण सेवा संस्थान ने उत्तर प्रदेश के बहराइच की 26 साल की चांदनी को जापानी और जर्मन तकनीक से बने 3D प्रिंटेड कृत्रिम पैर लगाकर नई जिंदगी दी है। 12 साल की उम्र में हुए एक दर्दनाक ट्रेन हादसे में घुटनों तक दोनों पैर गंवाने के बाद चांदनी पिछले 14 साल से बिना पैरों के ही जीवन जी रही थीं।

मोहम्मद फ़ैज़ान

मोहम्मद फ़ैज़ान

संपादक

20 जुलाई 20263 मिनट पढ़ें
14 साल का लंबा संघर्ष खत्म: हादसे में पैर गंवाने वाली चांदनी ने फिर थामी जिंदगी की डोर
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उत्तर प्रदेश के बहराइच की रहने वाली 26 वर्षीय चांदनी के लिए पिछले 14 साल किसी लंबी और कठिन परीक्षा से कम नहीं थे। महज 12 साल की उम्र में एक भीषण ट्रेन हादसे का शिकार होने के बाद उन्होंने अपने दोनों पैर घुटनों तक खो दिए थे। इतने लंबे समय तक चलने-फिरने की क्षमता खो देने के बाद, अब उदयपुर के नारायण सेवा संस्थान ने उन्हें एक नई उम्मीद दी है। अत्याधुनिक 3D प्रिंटेड कृत्रिम पैरों की मदद से चांदनी एक बार फिर अपने पैरों पर खड़ी हो गई हैं।

ट्रेन हादसे ने बदल दी थी जिंदगी

यह दर्दनाक घटना तब घटी जब चांदनी अपने चाचा के साथ नाना के घर जाने के लिए स्टेशन पहुंची थीं। ट्रेन में सवार होते समय उनका संतुलन बिगड़ा और वह पटरियों के बीच गिर गईं। ट्रेन की चपेट में आने से उनके दोनों पैर घुटनों तक कट गए। उस हादसे ने न केवल उनके शारीरिक अंगों को छीना, बल्कि उनके सपनों और आत्मनिर्भरता को भी सीमित कर दिया। अगले 14 वर्षों तक चांदनी को अपनी रोजमर्रा की जरूरतों के लिए दूसरों पर निर्भर रहना पड़ा।

घर की चारदीवारी में सिमटी चांदनी के मन में हमेशा यह टीस रहती थी कि क्या वह कभी सामान्य लोगों की तरह चल पाएंगी। दूसरों को चलते हुए देखकर उनके मन में एक गहरी कसक उठती थी, लेकिन संसाधनों की कमी और सही मार्गदर्शन न मिल पाने के कारण यह सपना अधूरा सा लग रहा था।

उदयपुर में मिली नई तकनीक का सहारा

करीब एक महीने पहले चांदनी के परिवार को उदयपुर स्थित नारायण सेवा संस्थान के बारे में जानकारी मिली। बिना समय गंवाए परिजन उन्हें लेकर उदयपुर पहुंचे। संस्थान के विशेषज्ञों ने चांदनी की स्थिति का बारीकी से आकलन किया और जापानी व जर्मन तकनीक से सुसज्जित 3D प्रिंटेड 'नारायण मॉड्यूलर आर्टिफिशियल लिम्ब' तैयार किए। यह तकनीक न केवल वजन में हल्की है, बल्कि इसे पहनने वाले व्यक्ति को चलने में अधिक संतुलन और सुविधा प्रदान करती है।

कृत्रिम पैर लगाने के बाद चांदनी को संस्थान में ही विशेषज्ञों की देखरेख में चलने का विशेष प्रशिक्षण दिया गया। शुरुआत में यह प्रक्रिया चुनौतीपूर्ण थी, लेकिन चांदनी के दृढ़ संकल्प और संस्थान के सहयोग ने इसे संभव बना दिया। कुछ ही दिनों के अभ्यास के बाद, वह बिना किसी बाहरी सहारे के चलने में सक्षम हो गईं।

आत्मविश्वास के साथ नई शुरुआत

आज चांदनी न केवल अपने पैरों पर चल रही हैं, बल्कि अपने दैनिक कार्यों को भी स्वयं पूरा करने लगी हैं। 14 साल के लंबे इंतजार के बाद दोबारा खड़ा होना उनके और उनके परिवार के लिए किसी चमत्कार से कम नहीं है। उनकी यह कहानी न केवल उनके जीवन में आई खुशहाली को दर्शाती है, बल्कि उन हजारों दिव्यांगजनों के लिए भी एक मिसाल है जो विपरीत परिस्थितियों में भी हार नहीं मानते।

नारायण सेवा संस्थान का यह प्रयास साबित करता है कि सही तकनीक और मानवीय संवेदनाओं के मेल से किसी के भी जीवन को बदला जा सकता है। चांदनी की यह नई शुरुआत अब उन्हें समाज की मुख्यधारा में फिर से शामिल होने का साहस दे रही है, जिससे वह अपने भविष्य को लेकर अब अधिक सकारात्मक महसूस कर रही हैं।

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टिप्पणियाँ (2)

  • अ
    अमित कुमार2 घंटे पहले

    बहुत बढ़िया और संतुलित रिपोर्टिंग। FN News पर भरोसा बना रहता है।

  • स
    सपना ठाकुर4 घंटे पहले

    ग्वालियर-चंबल की खबरें इतनी डिटेल में और कहीं नहीं मिलतीं। शुक्रिया!

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