इलाहाबाद हाईकोर्ट ने आजमगढ़ के आरोपी की याचिका ठुकराई, जमानत प्रक्रिया को लेकर दिया यह निर्देश
इलाहाबाद हाईकोर्ट ने आजमगढ़ जिले के विभिन्न थानों में दर्ज 20 आपराधिक मामलों में विचारण अदालत को दो जमानतदार और व्यक्तिगत बॉन्ड स्वीकार करने का निर्देश देने की मांग वाली याचिका खारिज कर दी है। यह आदेश न्यायमूर्ति सौरभ श्रीवास्तव की एकलपीठ ने मोहम्मद कलीम खान की याचिका पर पारित किया।

मोहम्मद नवेद
एडिटर

इलाहाबाद हाईकोर्ट ने आजमगढ़ जिले में दर्ज 20 आपराधिक मामलों का सामना कर रहे एक आरोपी की याचिका को खारिज कर दिया है। याचिकाकर्ता ने कोर्ट से मांग की थी कि निचली अदालत को यह निर्देश दिया जाए कि वह सभी मामलों में केवल दो जमानतदार और व्यक्तिगत बॉन्ड के आधार पर जमानत स्वीकार करे। न्यायमूर्ति सौरभ श्रीवास्तव की एकलपीठ ने इस मामले की सुनवाई करते हुए याचिकाकर्ता को राहत देने से इनकार कर दिया।
क्या था पूरा मामला?
याचिकाकर्ता मोहम्मद कलीम खान के खिलाफ आजमगढ़ के विभिन्न थानों जैसे जयनपुर, गंभीरपुर, जहानागंज, कप्तानगंज, अतरौलिया, अहरौला, महमूरगंज, सराय मीर, टेहबरपुर, खंधरापुर, देवगांव, फूलपुर और रानी की सराय में कुल 20 मामले दर्ज हैं। इन मामलों में भारतीय दंड संहिता (आईपीसी) और भारतीय न्याय संहिता (बीएनएस) की विभिन्न धाराओं के तहत आरोप तय किए गए हैं। याचिकाकर्ता को इन सभी मामलों में पहले ही जमानत मिल चुकी थी, लेकिन निचली अदालत में जमानत बॉन्ड दाखिल करने की प्रक्रिया को लेकर यह विवाद उत्पन्न हुआ।
याचिकाकर्ता के वकीलों का तर्क था कि 20 अलग-अलग मामलों के लिए अलग-अलग जमानतदार पेश करना एक कठिन प्रक्रिया है। इसलिए, हाईकोर्ट को निचली अदालत को यह निर्देश देना चाहिए कि वह सभी मामलों में एक समान जमानतदार और व्यक्तिगत बॉन्ड स्वीकार करे ताकि आरोपी को राहत मिल सके।
कोर्ट ने क्यों खारिज की याचिका?
सुनवाई के दौरान हाईकोर्ट ने याचिकाकर्ता के अधिवक्ता से सीधा सवाल किया कि क्या उन्होंने निचली अदालत में जमानत बॉन्ड दाखिल करने का कोई प्रयास किया था। साथ ही, यह भी पूछा गया कि क्या अधीनस्थ अदालत ने अलग-अलग जमानतदार मांगने पर कोई औपचारिक इनकार किया है। अधिवक्ता ने स्वीकार किया कि याचिकाकर्ता ने अभी तक निचली अदालत में जमानत बॉन्ड दाखिल करने का कोई प्रयास ही नहीं किया है।
अदालत ने इस स्थिति पर कड़ी टिप्पणी करते हुए कहा कि जब निचली अदालत ने अभी तक कोई आदेश पारित नहीं किया है और न ही कोई इनकार रिकॉर्ड पर है, तो हाईकोर्ट के हस्तक्षेप का कोई ठोस आधार नहीं बनता। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि बिना किसी कानूनी प्रक्रिया का पालन किए या निचली अदालत में आवेदन दिए सीधे हाईकोर्ट आना उचित नहीं है।
भविष्य के लिए क्या रास्ता खुला?
याचिका खारिज करते हुए कोर्ट ने याचिकाकर्ता को कानूनी छूट भी दी है। अदालत ने कहा कि याचिकाकर्ता सुप्रीम कोर्ट के 'हनी निशाद उर्फ मोहम्मद इमरान उर्फ विक्की बनाम उत्तर प्रदेश राज्य' मामले में दिए गए फैसले का हवाला देते हुए निचली अदालत में नए सिरे से आवेदन दाखिल कर सकता है। यदि याचिकाकर्ता ऐसा करता है, तो निचली अदालत को कानून के अनुसार उस पर विचार करना होगा।
यह मामला जमानत प्रक्रिया के सरलीकरण और कानूनी प्रक्रियाओं के पालन को लेकर एक महत्वपूर्ण उदाहरण है। कोर्ट ने स्पष्ट कर दिया है कि निचली अदालतों की कार्यप्रणाली में हस्तक्षेप करने से पहले याचिकाकर्ता को संबंधित अदालत में अपनी बात रखनी चाहिए।
इस आदेश के बाद अब याचिकाकर्ता को निचली अदालत का रुख करना होगा, जहां वह अपने सभी मामलों में जमानत बॉन्ड और जमानतदारों की संख्या को लेकर अपनी अर्जी पेश कर सकेगा। निचली अदालत अब सुप्रीम कोर्ट के निर्देशों के आलोक में इस पर निर्णय लेने के लिए स्वतंत्र होगी।

एडिटर
मोहम्मद नवेद
टिप्पणियाँ (2)
- अअमित कुमार2 घंटे पहले
बहुत बढ़िया और संतुलित रिपोर्टिंग। FN News पर भरोसा बना रहता है।
- ससपना ठाकुर4 घंटे पहले
ग्वालियर-चंबल की खबरें इतनी डिटेल में और कहीं नहीं मिलतीं। शुक्रिया!