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इलाहाबाद हाईकोर्ट का बड़ा फैसला: सहायता प्राप्त स्कूलों में मानदेय पर शिक्षकों की नियुक्ति नीति रद्द

इलाहाबाद हाईकोर्ट की लखनऊ खंडपीठ ने सहायता प्राप्त माध्यमिक विद्यालयों में शिक्षकों के रिक्त स्वीकृत पदों को मानदेय पर भरने की राज्य सरकार की नीति को रद्द कर दिया है। कोर्ट ने कहा कि स्वीकृत पद पर अस्थायी रूप से नियुक्त शिक्षक को संबंधित पद का न्यूनतम वेतनमान और अनुमन्य भत्ते दिए जाने चाहिए।

मोहम्मद नवेद

मोहम्मद नवेद

एडिटर

24 अगस्त 20263 मिनट पढ़ें
इलाहाबाद हाईकोर्ट का बड़ा फैसला: सहायता प्राप्त स्कूलों में मानदेय पर शिक्षकों की नियुक्ति नीति रद्द
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इलाहाबाद हाईकोर्ट की लखनऊ खंडपीठ ने उत्तर प्रदेश के सहायता प्राप्त माध्यमिक विद्यालयों में शिक्षकों की नियुक्ति को लेकर एक महत्वपूर्ण फैसला सुनाया है। न्यायालय ने राज्य सरकार की उस नीति को पूरी तरह से खारिज कर दिया है, जिसके तहत रिक्त पदों पर शिक्षकों को केवल मानदेय के आधार पर नियुक्त किया जा रहा था। कोर्ट ने स्पष्ट किया है कि स्वीकृत पदों पर काम करने वाले शिक्षकों को न्यूनतम वेतनमान और सभी अनुमन्य भत्ते पाने का पूरा अधिकार है।

दो शासनादेशों को किया गया निरस्त

न्यायमूर्ति राजीव सिंह की पीठ ने मनोज कुमार सिंह समेत लगभग 190 याचिकाओं पर एक साथ सुनवाई करते हुए यह आदेश पारित किया। कोर्ट ने राज्य सरकार द्वारा 9 नवंबर 2023 और 8 जुलाई 2024 को जारी किए गए शासनादेशों को असंवैधानिक मानते हुए निरस्त कर दिया है। इन आदेशों के माध्यम से पहले तदर्थ शिक्षकों की सेवाएं समाप्त की गई थीं और बाद में शिक्षकों की कमी का हवाला देकर उन्हें मानदेय पर रखने की व्यवस्था लागू की गई थी।

न्यायालय ने सरकार की इस दोहरी नीति पर कड़ी आपत्ति जताई है। कोर्ट ने कहा कि एक तरफ तदर्थ शिक्षकों को हटाना और दूसरी तरफ उसी पद पर कम वेतन में नए लोगों को रखना 'अपरोबेट एंड रीप्रोबेट' के कानूनी सिद्धांत के पूरी तरह विपरीत है। यह व्यवस्था न केवल शिक्षकों के हितों के खिलाफ है, बल्कि शिक्षा की गुणवत्ता को भी प्रभावित करने वाली है।

वेतनमान और अधिकारियों की जवाबदेही पर सवाल

सरकार की विवादित नीति के तहत हाईस्कूल स्तर के शिक्षकों को 25 हजार और इंटरमीडिएट स्तर के शिक्षकों को 30 हजार रुपये मासिक मानदेय देने का प्रावधान किया गया था। जबकि, इन पदों का निर्धारित वेतनमान क्रमशः 44,900 से 1,42,400 रुपये और 47,600 से 1,51,100 रुपये के बीच है। कोर्ट ने इसे अनुचित बताते हुए कहा कि स्वीकृत पद पर काम करने वाले व्यक्ति को उसके पद के अनुरूप वेतन न देना नियमों का उल्लंघन है।

सुनवाई के दौरान कोर्ट ने शिक्षा विभाग के अधिकारियों की कार्यप्रणाली पर भी गंभीर सवाल उठाए। न्यायाधीश ने टिप्पणी की कि सहायता प्राप्त विद्यालयों में शिक्षकों के हजारों पद लंबे समय से खाली पड़े हैं, जिसका सीधा नुकसान छात्रों को हो रहा है। यदि विद्यालय प्रबंधन ने रिक्तियों की जानकारी नहीं दी थी, तो जिला विद्यालय निरीक्षक को अपने स्तर से इसकी सूचना चयन बोर्ड को भेजनी चाहिए थी। कोर्ट ने पूछा कि इस प्रशासनिक लापरवाही के लिए अब तक किसी की जवाबदेही क्यों तय नहीं की गई।

भविष्य के लिए नई व्यवस्था के निर्देश

हाईकोर्ट ने राज्य सरकार को निर्देश दिया है कि वह अब कानून के अनुरूप एक नई और पारदर्शी व्यवस्था तैयार करे। कोर्ट ने स्पष्ट किया है कि जब तक नियमित शिक्षक का चयन नहीं हो जाता, तब तक अस्थायी नियुक्ति की जा सकती है। हालांकि, ऐसी नियुक्ति के लिए संबंधित आयोग की संस्तुति अनिवार्य होगी और नियुक्त शिक्षक को उस पद का न्यूनतम वेतनमान और सभी भत्ते दिए जाने होंगे।

इस फैसले से प्रदेश के हजारों शिक्षकों को बड़ी राहत मिलने की उम्मीद है। न्यायालय ने यह भी सुनिश्चित करने को कहा है कि अधिकारियों की लापरवाही का खामियाजा भविष्य में विद्यार्थियों की पढ़ाई को न भुगतना पड़े। सरकार को अब इस आदेश के अनुपालन में अपनी भर्ती प्रक्रिया में व्यापक बदलाव करने होंगे।

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टिप्पणियाँ (2)

  • अ
    अमित कुमार2 घंटे पहले

    बहुत बढ़िया और संतुलित रिपोर्टिंग। FN News पर भरोसा बना रहता है।

  • स
    सपना ठाकुर4 घंटे पहले

    ग्वालियर-चंबल की खबरें इतनी डिटेल में और कहीं नहीं मिलतीं। शुक्रिया!

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