मध्यप्रदेश मतदाता सूची विवाद: हाई कोर्ट ने राज्य सूचना आयोग को 45 दिन में फैसला लेने के दिए निर्देश
मध्यप्रदेश में विशेष संक्षिप्त पुनरीक्षण के दौरान मतदाता सूची से हटाए गए नामों से जुड़ी बूथवार जानकारी मांगने के मामले में हाई कोर्ट की इंदौर पीठ ने राज्य सूचना आयोग को समय-सीमा में फैसला करने के निर्देश दिए हैं। कोर्ट ने याचिकाकर्ता दिलीप कौशल की राज्य सूचना आयोग में लंबित दूसरी अपील का 45 दिन के भीतर गुण-दोष के आधार पर निराकरण करने को कहा है।

मुश्ताक अहमद खान
Editor In Chief

मतदाता सूची से हटाए गए नामों का मामला
मध्यप्रदेश में मतदाता सूची के विशेष संक्षिप्त पुनरीक्षण के दौरान हटाए गए नामों से जुड़ी बूथवार जानकारी को लेकर चल रहे विवाद में हाई कोर्ट की इंदौर पीठ ने एक महत्वपूर्ण आदेश पारित किया है। कोर्ट ने राज्य सूचना आयोग को निर्देश दिए हैं कि वह इस मामले में लंबित दूसरी अपील का निपटारा 45 दिनों के भीतर करे। यह मामला प्रदेश की सभी 230 विधानसभा सीटों पर पुनरीक्षण प्रक्रिया के दौरान हटाए गए मतदाताओं के आंकड़ों की पारदर्शिता से जुड़ा है।
याचिकाकर्ता दिलीप कौशल ने सूचना के अधिकार (RTI) के तहत यह जानकारी मांगी थी कि पुनरीक्षण के दौरान किन आधारों पर और कितने मतदाताओं के नाम सूची से हटाए गए। मुख्य निर्वाचन पदाधिकारी कार्यालय ने इस जानकारी को 'आंतरिक उपयोग' का बताते हुए देने से इनकार कर दिया था, जिसके बाद यह मामला कानूनी पचड़ों में फंस गया।
क्या है पूरा मामला और RTI का विवाद
दिलीप कौशल ने 11 दिसंबर 2025 को RTI आवेदन दायर कर सभी 230 विधानसभा क्षेत्रों की बूथवार जानकारी मांगी थी। निर्वाचन अधिकारी ने 20 दिसंबर 2025 को आवेदन खारिज कर दिया, जिसके बाद प्रथम अपीलीय अधिकारी ने भी 29 जनवरी 2026 को अपील को निरस्त कर दिया। इसके अगले ही दिन, 30 जनवरी 2026 को कौशल ने राज्य सूचना आयोग, भोपाल में दूसरी अपील दायर की थी।
आरोप है कि आयोग में अपील लंबित रहने के बावजूद सुनवाई में देरी की गई। 15 जून 2026 को अति आवश्यक सुनवाई के लिए आवेदन देने के बाद भी जब कोई कार्रवाई नहीं हुई, तो याचिकाकर्ता ने हाई कोर्ट का दरवाजा खटखटाया। 5 सितंबर 2026 को दायर रिट याचिका में इस देरी को चुनौती दी गई थी।
हाई कोर्ट का रुख और भविष्य की राह
हाई कोर्ट में सुनवाई के दौरान याचिकाकर्ता के वकीलों ने तर्क दिया कि चुनावी प्रक्रिया से जुड़ी जानकारी सार्वजनिक महत्व की है और इसे छिपाना अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के अधिकार का हनन है। हालांकि, हाई कोर्ट ने स्वयं जानकारी देने या न देने पर कोई आदेश नहीं दिया, बल्कि राज्य सूचना आयोग को ही कानून के दायरे में रहकर गुण-दोष के आधार पर 45 दिन में निर्णय लेने का निर्देश दिया है।
कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया है कि आयोग को अपने अंतिम निर्णय की एक प्रति याचिकाकर्ता को अनिवार्य रूप से उपलब्ध करानी होगी। इस आदेश के साथ ही हाई कोर्ट ने रिट याचिका का निराकरण कर दिया है।
याचिकाकर्ता दिलीप कौशल ने स्पष्ट किया है कि यदि निर्धारित समय-सीमा के भीतर आयोग पारदर्शी तरीके से निर्णय नहीं लेता है, तो वे इस मामले को लेकर सुप्रीम कोर्ट तक जाने के लिए तैयार हैं। उन्होंने प्रक्रिया में देरी को लेकर अपनी नाराजगी जाहिर की है।
यह पहली बार नहीं है जब मतदाता सूची पुनरीक्षण को लेकर कानूनी सवाल उठाए गए हैं। नवंबर 2025 में भी इसी तरह की विसंगतियों को लेकर हाई कोर्ट ने राज्य सरकार और निर्वाचन आयोग से जवाब तलब किया था। वर्तमान मामला सीधे तौर पर RTI के तहत मांगी गई जानकारी के अधिकार और आयोग की कार्यप्रणाली पर केंद्रित है।

Editor In Chief
मुश्ताक अहमद खान
टिप्पणियाँ (2)
- अअमित कुमार2 घंटे पहले
बहुत बढ़िया और संतुलित रिपोर्टिंग। FN News पर भरोसा बना रहता है।
- ससपना ठाकुर4 घंटे पहले
ग्वालियर-चंबल की खबरें इतनी डिटेल में और कहीं नहीं मिलतीं। शुक्रिया!